आपकी दिल्ली !
दिल्ली वार सिमेट्री
दिल्ली के भूतिया जगहों में इसका भी नाम शामिल है।कहने वाले तो यहाँ तक कहते हैं कि उन्होंने यहाँ दिन में ही सफेद साड़ी में लिपटी और सड़क पार करती हुई स्त्री को देख है जो अचानक से प्रकट अचानक से गायब भी हो गयी है।
तो आज मैं आपको उसी जगह पर लेकर जा रहे हैं जिसके बारे में दिल्ली के भी अधिकतर लोगों को पता ही नहीं है कि दिल्ली में ‘वॉर सिमिट्री’ नामक कोई जगह भी है। मैंने दिल्ली के लगभग बीस हजार लोगों से इसके बारे में पूछा पर एक भी आदमी इसके बारे में नहीं बता पाया।
ध्यान रखिये ये ‘वॉर सिमिट्री’ है इसे ‘वॉर मेमोरियल’ से तुलना मत करियेगा। ये जगह लोगों की नजरों से दूर है, पर यदि आप यहाँ जाना चाहें तो फिर ये ज्यादा दूर भी नहीं।
इसका अपना एक अलग ऐतिहासिक महत्व है। दरअसल द्वितीय विश्व युद्ध (1939-45) के दौरान शहीद हुए सैनिकों की याद में बनाया गया स्मारक है ये। जहाँ ज्यादातर गोरखा रेजिमेंट में काम करने वाले सैनिकों की समाधियाँ बनी हुई है जिसमें अंग्रेजों की ही संख्या बहुत ज्यादा है। अनुमान है कि ऐसी करीब 1000 से ज्यादा समाधि बनी है इस ‘वॉर सिमिट्री’ में।
‘गुज़रे मगर भुलाए नहीं गए’ के विचार से प्रेरित इस सिमिट्री में उन सैनिकों को दफ़नाया हुआ है जो दूसरे विश्व युद्ध में ब्रिटिश कॉमनवेल्थ के लिए लड़े थे | यहाँ चारों ओर हरियाली और करीने से तराशे हुए बगीचे हैं | यहाँ के ऊँचे स्तंभों और अनोखे स्मारको को देखकर आप चमत्कृत हो जायेंगे।
दिल्ली युद्ध कब्रिस्तान ( Delhi war Cemetry )1951 में बनाया गया था जब उत्तरी भारत के कई कब्रिस्तानों से कब्रों को उनके स्थायी रखरखाव को सुनिश्चित करने के लिए साइट पर ले जाया गया था। इनमें इलाहाबाद, कानपुर, देहरादून और लखनऊ में छावनी कब्रिस्तानों की कब्रें हैं। इस कब्रिस्तान में अब द्वितीय विश्व युद्ध के 1,022 राष्ट्रमंडल मृतकों को दफनाया गया है, या विशेष स्मारक द्वारा याद किया गया है, साथ में अन्य राष्ट्रीयताओं की कई युद्ध कब्रें हैं, जिनमें ज्यादातर डच हैं।
1966 में, 99 प्रथम विश्व युद्ध के अंत्येष्टि को निकोलसन कब्रिस्तान, कश्मीर गेट, दिल्ली से कब्रिस्तान में ले जाया गया, ताकि उनके स्थायी रखरखाव का आश्वासन दिया जा सके।
दिल्ली युद्ध कब्रिस्तान में दिल्ली 1914-18 स्मारक भी शामिल है, जिसे मेरठ छावनी कब्रिस्तान में दफन 153 मृतकों की याद में बनाया गया था, जिनकी कब्रों का रखरखाव अब नहीं किया जा सकता है। हालांकि, हाल के वर्षों में आयोग ने इन कब्रों को फिर से स्थापित किया है।
अविभाजित भारत की सेनाओं के 25,000 से अधिक सैनिक द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान गैर-संचालन क्षेत्रों में मारे गए जैसे उदाहरण के लिए रेजिमेंटल डिपो या अन्य स्थिर इकाइयों के साथ सेवा करते हुए। उनके अवशेषों को उनके विभिन्न धर्मों के लिए आवश्यक अंतिम संस्कार और निपटान दिया गया था और उनके नाम भारत और पाकिस्तान की राजधानी शहरों में स्मारकों में याद किए जाते हैं।
दिल्ली 1939-45 युद्ध स्मारक दिल्ली युद्ध कब्रिस्तान का प्रवेश द्वार बनाता है और कराची युद्ध कब्रिस्तान में एक समान स्मारक खड़ा है। स्मारकों पर कोई नाम नहीं है, लेकिन प्रत्येक स्थल पर एक रोल ऑफ ऑनर है, एक हिंदी में, दूसरा उर्दू में, स्मरण किए जाने वालों के नाम दर्ज हैं।
जब हम वहाँ गए तो घास काटने वालों के सिवा कोई नजर नहीं आया। जगह छोटी है लेकिन बहुत शांत। अगर आप कुछ नया अनुभव करना चाहते हैं तो ये जगह आपको बहुत पसंद आएगा। खूबसूरत और बेहद शांत इस जगह पर आपको एक बार तो अवश्य जाना चाहिए।
कैसे पहुँचें ?
दिल्ली कैंट की बस या मेट्रो से जा सकते हैं।
जो रास्ता छावनी की ओर जाता है, उसमें ही लगभग डेढ़-दो किलोमीटर आगे चलकर आपको ये ‘वॉर सिमिट्री’ दिख जाएगी। कैब से भी जा सकते हैं, मगर मैं कहूँगा कि पैदल ही जाएँ क्योंकि इलाका काफी शान्त है और दिल्ली में ऐसी शांति मिलना बेहद मुश्किल। शायद तस्वीर देखकर आपको अनुमान लग ही गया होगा।
एक बात और : हम वहाँ बहुत देर तक विचरते रहे , बाहर मेट्रो कैंट स्टेशन से पैदल ही गये और लौटे भी। परन्तु उस सफेद साड़ी में लिपटी भूतनी के दीदार न हुए। काश कोई मिल जाती ये गाते हुए ~ गुमनाम है कोई !
बता दूँ आपको इस चक्कर में दो बार गया मैं वहाँ पर निराशा ही हाथ लगी।
मेट्रो से : दिल्ली कैंट मेट्रो स्टेशन
बस से : बरार स्कवायर बस स्टैंड यहाँ से 636 , 448 , 794 , 445 , 544 , 721, 794A नम्बर की बस यहाँ से गुजरती है।
निजी कार से जाना सबसे ठीक। पार्किंग की कोई समस्या नहीं।
प्रवेश शुल्क निःशुल्क है।
यह कैंट एरिया में है अतः अपना कोई सरकारी परिचय अपने पास अवश्य रखें।