आंध्रा दर्शन !
आज हम आपको हवा में झूलते खम्बे पर टिकी एक अद्भुत मन्दिर की सैर करा रहे हैं जिसका 70 खंभा , जो इस मंदिर का ऐसा रहस्य है कि विज्ञान भी हैरान इंजीनियर भी परेशान और देखनेवाले अचंभित !
हम बात कर रहे आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में स्थापित लेपाक्षी या वीर भद्र मंदिर की जो 70 खंभों पर खड़ा है। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि मंदिर का एक खंभा जमीन को छूता ही नहीं है बल्कि हवा में झूलता रहता है।
इसी कारण से इस मंदिर को हैंगिंग टेंपल के नाम से भी जाना जाता है।
यहाँ आने वाला हर व्यक्ति जाँच करने के लिए खंबे के नीचे अपना कपड़ा , चुनरी , दुपट्टा या पतला तौलिया डालकर जरूर देखता है। और अचंभित रह जाता है कि खम्बे के नीचे से कपड़ा आर पार हो जाता है।
मैंने भी अपनी पत्नी के दुपट्टे को इस स्तम्भ के नीचे फैला कर डाला तो आर पार हो गया।
लेपाक्षी मंदिर को आकाश स्तंभ के नाम से भी जाना जाता है। ये खंबा जमीन से आधा इंच ऊपर उठा हुआ है।
मान्यता यह भी है कि खंभे के नीचे से कुछ गुजारने से घर में सुख-समृद्धि आती है। यही वजह है कि यहाँ आने वाले लोग खंभे के नीचे से कपड़ा अवश्य ही गुजारते हैं।
अब हम थोड़ा 100 साल पीछे चलते हैं तो
1924 में एक ब्रिटिश इंजीनियर हैमिल्टन ने ‘रहस्य’ का पता लगाने के लिए स्तंभ को हिलाने की कोशिश की। ऐसा करते समय 10 और खंभे साथ में हिलने लगे और 25 फ़ीट दूर खड़े खम्बे में दरार आ गई। इस डर से कि पूरी संरचना ढह सकती है उन्होंने अपने प्रयास को तुरन्त ही उसी जगह पर रोक दिया। बाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने अच्छे से जाँच की और साबित किया कि स्तंभ का निर्माण गलती के रूप में नहीं किया गया था बल्कि उस समय के बिल्डरों की प्रतिभा को साबित करने के लिए जानबूझकर ऐसा बनाया गया था।
यदि हम मन्दिर के निर्माण की बात करें तो इस को लेकर अलग-अलग मत हैं। इस धाम में मौजूद एक स्वयंभू शिवलिंग भी है जिसे शिव का रौद्रअवतार यानी वीरभद्र अवतार माना जाता है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार यह शिवलिंग 15वीं शताब्दी तक खुले आसमान के नीचे विराजमान था। लेकिन 1538 में दो भाइयों विरुपन्ना और वीरन्ना ने मंदिर का निर्माण किया था जो विजयनगर राजा के यहां काम करते थे। वहीं पौराणिक मान्यताओं के अनुसार लेपाक्षी मंदिर परिसर में स्थित वीरभद्र मंदिर का निर्माण ऋषि अगस्त्य ने करवाया था।
मंदिर के इष्टदेव भगवान शिव के क्रूर रूप वीरभद्र हैं। वीरभद्र महाराज दक्ष के यज्ञ के बाद अस्तित्व में आए थे। इसके अलावा यहाँ भगवान शिव के अन्य रूप अर्धनारीश्वर, कंकाल मूर्ति, दक्षिणमूर्ति और त्रिपुरातकेश्वर भी मौजूद हैं। यहाँ विराजमान माता को भद्रकाली कहा जाता है।
कुर्मासेलम की पहाड़ियों पर बना यह मंदिर कछुए के आकार में बना हुआ है।
कुछ मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर का उल्लेख रामायण में भी मिलता है और यही वह जगह है जहाँ माता सीता की रक्षा के प्रयास में रावण से युद्ध करने के बाद जटायु घायल होकर गिर गए थे। यह तो आप जानते ही हैं कि बाद में श्रीराम को उन्होंने ही बताया था कि रावण ने ही सीता माता का अपहरण किया है।
मंदिर में एक बड़ा-सा पैर का निशान भी है जिसे त्रेता युग का गवाह माना जाता है। कोई इसे भगवान श्रीराम के पैर का निशान तो कोई माता सीता के पैर का निशान मानता है।
इस मंदिर में आपको एक अनोखा शिवलिंग भी देखने को मिलेगा जिसकी स्थापना मुख्य मंदिर के पिछले हिस्से में की गई है। इसकी खास बात यह है कि इसे एक विशालकाय नाग प्रतिमा के बीच बनाया गया है।
इस मंदिर का मुख्य आकर्षण का केंद्र महामंडप है। यह महामंडप कई स्तंभों से मिलकर बनाया गया है, जिसमें तुंबुरा, ब्रह्मा, पद्मिनी, नारद, दत्तात्रेय, रंभा और नटराज की आकृतियों को उकेरा गया है।
मंदिर परिसर में एक ‘अधूरा’ मैरिज हॉल या ‘कलयानमंडपम’ भी है। माना जाता है कि हॉल शिव और पार्वती के विवाह का जश्न मनाने के लिए बनाया गया था। पर इस हॉल को देखने के बाद आप यह जरूर सोचेंगे कि इसे जानबूझकर अधूरा क्यों छोड़ दिया गया ?
जवाब यह है कि कहा जाता है कि मन्दिर निर्माता विरुपन्ना का पुत्र अंधा था। एक बार जब उन्होंने मंदिर का निर्माण शुरू किया, तो उनके बेटे का अंधापन चमत्कारिक रूप से ठीक हो गया। लेकिन अन्य दरबारियों को जलन होने लगी और उन्होंने राजा से शिकायत की कि वह अपने बेटे के इलाज के लिए राज्य के पैसे का इस्तेमाल कर रहा है। क्रोधित होकर, राजा ने अपने आदमियों को विरुपन्ना को अंधा करने का आदेश दिया। अधूरे मैरिज हॉल की दीवारों पर लाल धब्बे उसकी आँखों का प्रतिनिधित्व करते हैं और उस घटना के बाद कोई भी हॉल को पूरा नहीं कर पाया।
लेपाक्षी मंदिर को लेकर एक और कहानी का पता चला। एक बार वैष्णव यानी विष्णु के भक्त और शैव यानी शिव के भक्त के बीच सर्वश्रेष्ठ होने की बहस शुरू हो गई जो कि सदियों तक चलती रही। जिसे रोकने के लिए ही अगस्त्य मुनि ने इसी स्थान पर तप किया और अपने तपोबल के प्रभाव से उस बहस को खत्म कर दिया। उन्होंने भक्तों को यह भी भान कराया कि विष्णु और शिव एक दूसरे के पूरक हैं। मंदिर के पास ही विष्णु का एक अद्भुत रूप है रघुनाथेश्वर का जहाँ विष्णु जी भगवान शंकर की पीठ पर आसन सजाए हुए हैं। यहाँ विष्णुजी को शिवजी के ऊपर रघुनाथ स्वामी के रूप में प्रतिष्ठित करने की वजह से वह रघुनाथेश्वर कहलाए।
मंदिर से सिर्फ 200 मीटर की ही दूरी पर आप एक विशाल नंदी प्रतिमा को पत्थर के एक खंड में देख सकते हैं। यह विशाल संरचना 27 फीट लंबी और 15 फीट ऊँची है और दुनिया की सबसे बड़ी उकेरी गई बैल प्रतिमा है। बैल पर नक्काशी और डिजाइन इतनी खूबसूरत हैं कि ऐसा लगता है कि इन्हें मशीनों के बिना बनाना संभव नहीं था। आज भी आर्किटेक्ट्स इसकी डिजाइनिंग को लेकर आश्चर्य में हैं।
इस जगह के लेपाक्षी नाम को लेकर भी एक कहानी है जो रामायण से जुड़ी हुई है। यह वो जगह है जहाँ रावण द्वारा पराजित होने के बाद गिद्धराज जटायु गिर गए थे। और जब भगवान राम ने पक्षी को देखा तो उन्होंने कहा, ‘ले पाक्षी’ जिसका तेलगु भाषा में अर्थ है ‘उदय, पक्षी’। इस तरह गांव का नाम लेपाक्षी पड़ा।
लेपाक्षी मंदिर में कैसे पहुंचें ?
लेपाक्षी मंदिर का निकटतम रेलवे स्टेशन हिन्दुपुर है जो मंदिर से 14 किमी दूर है।
इसके साथ-साथ मंदिर अनंतपुर और बेंगलुरु से सड़क मार्ग से भी जुड़ा हुआ है।
लेपाक्षी मंदिर के लिए परिवहन के अन्य साधन भी आसानी से मिल जाते हैं।
यदि बंगलोर से जाना चाहें तो बंगलोर एयरपोर्ट से इसकी दूरी 120 कि मी है। बंगलोर शहर से एयरपोर्ट 50 कि मी दूर है।
अपनी सवारी से जाने वालों के लिए पार्किंग की बहुत उचित व्यवस्था है।
एक विशेष बात : लेपाक्षी मन्दिर में जाने के लिए आप अपने जूते बाहर ही स्टैंड पर न उतारें। वहाँ से मन्दिर तक के रास्ते काफी पथरीले और दूर है।
जबकि मन्दिर के मुख्य द्वार के ठीक बाहर ही जूता स्टैंड बना हुआ है। जूते वहीं उतारें न कि लोगों की देखा देखी बाहर ही के स्टैंड पर।
आंध्रा दर्शन के अगले सैर में ‘सैर जटायु मन्दिर की’ का इंतजार करें।

















