Dilli ACHRAJ se BhArI!

निराली दिल्ली !

विचित्रताओं से भरी आपकी दिल्ली में आज हम आपको एक ऐसी जगह को ले चल रहे हैं जो अभी से चंद महीने पहले तक नजर भी नहीं आता था। आप सोच रहे होंगे कि छुपा हुआ था तो अब कहाँ से और कैसे मिल गया।
आपकी जिज्ञासा बिल्कुल सही है। पर आपकी जिज्ञासा शान्त करने के पहले ये तो बता दें कि वो जगह है कौन सी।
तो आपको बता दें कि यह जगह हैं 400 साल पुराना बारापुला जो निजामुद्दीन बस टर्मिनल के बगल में मौजूद है।

पीडब्‍ल्‍यूडी के जिस पुल से मौजूदा समय में आना जाना होता है, वह ऊँचा है और बारापुला पुल नीचा है। इस पर आसपास के लोगों ने पूरी तरह से अतिक्रमण रखा था। एक ओर प्रवेश बिंदु पर लोगों ने पक्‍का निर्माण तक कर रखा था जिसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने अब हटवा दिया है। इस वजह से पहले आपकी नजर नहीं पड़ती थी। पुल के दोनों ओर तीन-तीन मीटर में बने अवैध निर्माण को हटा दिया गया है। तो अब यह आपको नजर आनेलगा है जो आप इसके पुनरुद्धार होते तस्वीरों के माध्यम से देख भी सकते हैं।

पुल के नीचे नाला जाता है जो पिछले दिनों बारिश से नाले का पानी पुल के ऊपर आ गया और आसपास के इलाकों में भर गया। इसके बाद दिल्‍ली के उपराज्‍यपाल स्‍वयं मौके पर गए और निरीक्षण किया। साथ ही, तत्‍काल सफाई के लिए सिंचाई विभाग को आदेश भी दिया। और अतिक्रमण को भी हटवा दिया। पिछले करीब तीन माह से इसकी सफाई का काम चल रहा है जो आगामी दो महीने में पूरा हो जायेगा।

इतिहासकारों के अनुसार यह पुल सन् 1624 में बनाया गया था और इसके और हुमायूं के मकबरे के बीच की चौड़ी सड़क पर एक कतार से पेड़ हुआ करते थे। इसे कभी दिल्ली के सबसे खूबसूरत पुलों में से एक माना जाता था।

माना जाता है कि मुगलों द्वारा इस पुल का उपयोग दिल्ली से तत्कालीन राजधानी आगरा के रास्ते में आने वाली यमुना को पार करने और निजामुद्दीन की दरगाह तथा हुमायूँ के मकबरे तक पहुंचने के लिए किया जाता था। यह पुल वास्तुशिल्प, इंजीनियरिंग और राजमिस्त्रियों द्वारा किए गए निर्माण का एक लाजवाब नमूना है जो अभी तक अतिक्रमण और निर्माण के कारण छिपा हुआ था।

200 मीटर लंबे इस पुल को करीब 400 वर्ष पूर्व सम्राट जहांगीर के सरंक्षण में मीनार बानू आगा ने बनवाया था। इसके बारह खंभों और ग्यारह मेहराबों की वजह से इसको बारापुला का नाम दिया गया था।

इतिहासकारों के अनुसार पुल का निर्माण मुगल बादशाह जहांगीर के कार्यकाल 1612 से 13 के बीच किया गया है, जबकि ए एसआई की रेकॉर्ड के अनुसार 1621-22 के मध्‍य इसका निर्माण हुआ है.

बारापुला को पुराने स्‍वरूप में वापस लाया जाएगा। अभी नाले की सफाई जोरों पर चल रही है। नाले साफ होने के बाद एएसआई मरम्‍मत का काम शुरू कराएगा। दोनों और गेट लगाए जा रहे हैं। एक ओर लग चुका है और दूसरी ओर जल्‍द लग जाएगा जिससे लोग इसे आम रास्‍ते की तरह इस्‍तेमाल न कर सकें। पुल के ऊपर दो फुट तारकोल और गिट्टी की पर्त चढ़ी है जिसे हटाया जाएगा जिससे पत्‍थरों का वास्वितक पुल दिखेगा। इसके जीर्णोद्धार का काम तीन से चार माह में पूरा हो जाएगा।

तीन चार माह में जीर्णोद्धार कार्य के दौरान यहाँ विशेष लाइटिंग की व्यवस्था की जाएगी। विकास कार्य के दौरान संरचना की मौलिकता को प्रभावित नहीं किया जाएगा।

अभी तक तो आप यहाँ पर हुमायूँ का मकबरा , निजामुद्दीन दरगाह और रहीम का खानेखाना ही देख पाते थे पर अब आप जल्द ही चौथा ऐतिहासिक महत्व की ये चौथी जगह भी देख पायेंगे।

कैसे पहुँचें ?

जंगपुरा से निजामुद्दीन रेलवे स्‍टेशन की ओर जाते समय बारापुला एलेवेटेड रोड के नीचे यह पुल पड़ेगा। हालांकि इस पुल पर आना जाना बंद है। साथ में पीडब्‍ल्‍यूडी का पुल बना है, जो जंगपुरा से स्‍टेशन की ओर आने-जाने के लिए उपयोग में आता है। इसके ठीक बगल में बारापुला पुल है।

बस स्टैंड है राजदूत होटल जहाँ से कई बसें गुजरती है। प्रमुख बसों में 427 , 181 है।

मेट्रो स्टेशन है निजामुद्दीन जहाँ से 500 मीटर की दूरी पर है ये।

निजी वाहन से जानेवालों के लिए पार्किंग की जगह नहीं है पर आप गाड़ी लगा भी सकते हैं।














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