नमस्ते दोस्तों
यह हिंदी भाषा में मेरी पहली पोस्ट है। उम्मीद है आपलोगों को जरुर पसंद आएगी।
कुछ महीने पहले मुझे हमारे देश की राजधानी नई दिल्ली गया था। दिल्ली भ्रमण के दौरान जब हम “जंतर मंतर” के समीप थे, हमसे गूगल मैप पर देखा की दिल्ली का एक प्रसिद्द डरावना स्थल “उग्रसेन की बावली” Ugrasen ki Baoli वहां से ज्यादा दूर नहीं था, इसलिए हमने यहाँ आने का निर्णय लिया। हमने हाल में ही एक मशहूर हिन्दी बॉलीवुड फिल्म ‘पीके’ में यह जगह देखा था।
'अग्रसेन की बावली’ से ‘इंडिया गेट’ से दो किलोमीटर और ‘जंतर मंतर’ से 1.5 किमी की दुरी पर स्थित है, यह भारत सरकार के द्वारा संरक्षित वास्तुकला का एक बेहतरीन उदहारण है। यह एक बहुत ही सुरम्य और प्रकृतिमनोहर स्थान जहां लोग दिल्ली के ट्रैफिक से दूर, शांत वातावरण में अच्छे समय बिताने और सुंदर तस्वीरें लेने के लिए आते है। यहाँ आने वाले ज्यादातर लोगों में दिल्ली के कॉलेजों के छात्र-छात्राएँ और गर्मी के दिनों में आने वाले स्थानीय लोग शामिल हैं, जिन्हें यहाँ आकर अक्सर आराम मिलता है क्योंकि यह बावली शहर की तेज गर्मी से राहत प्रदान कराती है।
सबसे पहले मैं आपको “बावली” के बारे में बता दूँ, यह क्या है? ‘बावड़ी’ या ‘बावली’ उन सीढ़ीदार कुँओं या तालाबों को कहते हैं जिनके जल तक सीढ़ियों के सहारे आसानी से पहुँचा जा सकता है। इंडिया में हड़प्पा काल से आधुनिक काल तक कुओं के निर्माण और उपयोग का लम्बा इतिहास है।
हालाँकि इसका निर्माण कब और कैसे हुआ, यह अभी तक अज्ञात है, लेकिन फिर भी इस बावली के बारे में विश्वास है कि महाभारत काल में इसका निर्माण कराया गया था। इतिहासकार लोग ऐसा मानते हैं की इस बावली का निर्माण सूर्यवंशी सम्राट महाराजा अग्रसेन ने करवाया था, इसलिए इसे ‘अग्रसेन की बावली’ कहते हैं। इसकी एक ख़ास विशेषता यह भी है कि यह बावली चारों तरफ़ से मकानों से घिरी है, जिससे किसी बाहरी व्यक्ति को पता भी नहीं चलता कि यहाँ कोई बावली भी है। यह बावली अभी भी बेहतर स्थिति में है। यहाँ पर नई दिल्ली और पुरानी दिल्ली के लोग कभी तैराकी सीखने के लिए आते थे।
क़रीब 60 मीटर लंबी और 15 मीटर ऊंची इस बावली का निर्माण लाल बलुए पत्थर से हुआ है। इसमें भूतल से निचे पानी तक पहुँचने के लिए 103 सीढ़ियाँ है। इसकी एक और विशेषता यह भी है कि यह उत्तर से दक्षिण दिशा में 60 मीटर लम्बी तथा भूतल पर 15 मीटर चौड़ी है। यह स्मारक सुबह 7 बजे से शाम 6 बजे तक खुला रहता है और यहाँ आने के लिए किसी प्रकार के प्रवेश शुल्क की आवश्यकता नहीं होती है।
इस जगह को इंडिया के डरावने जगहों में से एक माना जाता है (haunted place)। कई लोगों द्वारा इसे दिल्ली की सबसे डरावनी जगहों में से एक बताया गया है। ऐसा कहा जाता है कि किसी ज़माने में इस बावली में काला पानी हुआ करता था जो यहाँ आए उदास लोगों को अपनी तरफ सम्मोहित करके उसके अंदर कूद जाने को अपनी ओर विवश करता था। यह लोगों को अपनी और लुभा कर आत्महत्या करने को प्रेरित करता था। वास्तव में इस बावली में पर्याप्त पानी नहीं है और जो थोड़ा बहुत पानी है वह काला नहीं है। हालाँकि आज भी यह दिल्ली की सबसे रहस्यमयी जगहों में शुमार है।
जैसे-जैसे हम सीढ़ियों द्वारा कुँए के निचे गए, एक अजीब सी गहरी चुप्पी फैलने लगी और धीरे-धीरे आकाश भी गायब होने लगा। कबूतरों की गुटरगूँ और हजारों की तादात में चमगादड़ों की चीखें और फड़फड़ाहट जो दीवारों के अन्दर गूंज रही थी, इस जगह को और भी भयावह बना रहा था।
कई लोगों का यह कहना है, यहाँ बुरी आत्माएं रहती हैं। यहाँ आने वाले कई लोगों ने यहाँ अजीब सी उपस्थिति या परछाई के होने का महसूस किया है। इस रहस्यमयी अग्रसेन की बावली के साथ एक बहुत ही मजबूत और डरावना एहसास जुड़ा हुआ है जो लोगों को अंदर तक बुरी तरह से डरा देता है।
हालाँकि हमने ऐसा कुछ भी डरावना या आत्माओं के निवास को बिलकुल भी महसूस नहीं किया, इसके विपरीत हमने यहाँ काफी अच्छा समय व्यतीत किया। चूँकि हमारे मुंबई के ट्रेन का समय हो चला था, तो हम स्टेशन की तरफ चले गए।
मुझे आशा है की आपलोगों को मेरी यह पोस्ट जरुर पसंद आएगी,
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